For some reason, I was forced to imagine a world without paper and I came to a realization that it was impossible. Wherever you go you always find a piece of paper in one sq. meter of your surroundings. It may be in the form of money or any document or any bill or even as a warranty card.
I was sitting idle at home, not knowing what to do and came up with this poem.
बचपन मे कागज़ की बनाते थे नय्या ..
आज उसी कागज़ पर दुनिया करती ता-ता थैय्या ..
कागज़ की कश्ती तो फिर भी तैर जाती थी ..
पर ज़िन्दगी की नाव को कैसे संभाले ..
ओ उपरवाले.. इस कागज़ की दुनिया से मुझे बचाले..
इस कागज़ पे प्यार का इकरार इसी कागज़ पे शादी..
इसी कागज़ की वजह से तकरार और इसी कागज़ पे बर्बादी..
अब तो चैन, सुकून, शांति, ख़ुशी सब चले गए..
इस कागज़ के चक्कर में फँस गए जाने कितने दिलवाले
हे भगवान.. इस कागज़ की दुनिया से मुझे बचाले..
इन कागज़ के टुकडों पर विश्वास करती ये दुनिया..
इस अंगूठे को मेरी पेहचान कहती ये दुनिया..
कागज़(bible/geeta) पर हाथ रख कर कसम भी खिलवाती..
आँखों पर पट्टी बांधते है खुद इन्साफ करने वाले..
हे भगवान .. इस कागज़ की दुनिया से मुझे बचाले.
कागज़ से ज्यादा उपयोगी वास्तु ना कभी बनी थी ना कभी बनेगी..
हरी पत्ती देख कर दुनिया की हर हसीना तेरे जाल में फसेगी ..
ग़र जीना चाहता है राजेशाही ज़िन्दगी तू,
तो इस कागज़ की तू फैक्ट्री बनाले..
हे ऊपरवाले.. इस कागज़ की दुनिया से मुझे बचाले..
न पापा न मम्मी न मुन्ना ना मुनिया ..
न हीरो न ज़ीरो न वीरों की दुनिया ..
है ये कागज़ के भूखे फकीरों की दुनिया ..
Hope everyone likes it!
P.S.: My first poem!
waah waah, bahut khub janaab
Woah! Nice piece of work from our bollywood queen, ahem sorry king
Well well well…Some seems to be incredibly skilled…
some1